औडे कफ़न

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बदबू भारी भेड़ों में छुपता

औडे कफ़न

डरता संभलता

एक भूखा प्यासा बदन

भूख से तडपती वो रातें

भद्दे क़ानून से  मुलाक़ातें

देखा है  

ख़ुदा के बन्दों को

देते चोर उचकों को शासन

हरी प्रदेश में

देखा है

जुल्मी सावन

इस स्वदेश में 

ढूँढ़ते   देखा है

खुद  का आशियाना

गाँधी टोपी का

 कैसा   स्वराज

जो

जात पात का दीवाना

बेहोश लाचार मन को

रोते देखा है

एक देवता को

कायरों के गढ़ में

इंसाफ़ की उमीद

खोते देखा है

देखा है

बदलते बचपन को

बर्बाद अफ़साना

मासूम ज़िंदगियों को

भयानक कहानी बनते

देखा है

मैने  कुछ  बंधुओं को

नेताओं की  जीपों से

घिसटते देखा है

कुछ बंधुओं को

हरी प्रदेश की सड़को पे

मरते तडपते देखा है

गाँधी टोपी के

इसी स्वराज में

कुछ परिवारों को

उजडते देखा है

इन आँखो ने

हरी को खुद

धरती पर आ कर 

ज़ालिमों को

तमाचे भी

लगाते देखा है

देखा है बदलते बचपन को

बर्बाद अफ़साना

मासूम ज़िंदगियों को

भयानक कहानी बनते देखा है~ मोहन अलोक  

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