मेरा यार

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जज्बा -ऐ- मोहबत पर क्यों है उनका यह शक जज्बा -ऐ- मोहबत पर क्यों है उनका यह शक कुछ तो मेरे पिंडर -इ मोहब्बत का भरम रख तू भी तो कभी मनाने के लिए आ .. …. !!

 

 

 

“मेरा यार ना तो भंवरा था ना ही कली की उसे हसरत थी  !
एक भोला इन्सांन था वो जिससे साथी की जरूरत थी !!
जब भी वो किसी के दामन से मांगता सहारा !
बेदर्द ने कभी आशिक़ तो कभी भंवरा कह पुकारा !!
नहीं जानता था वो उस बेवफा के मन में कितनी नफरत थी !
मेरा यार ना तो भंवरा था ना ही कली की उसे हसरत थी !!
मेरा दोस्त नहीं देख पाया उनके मन का शैतान !
नहीं देख पाया शमा की आग और जुल गया नादान !!
पीठ पीछे इल्जाम लगाने वालों में नहीं हिम्मत थी !
कोण था जो उससे टकरा जाता नहीं किस्मे जुर्ररत थी !!
मेरा यार ना तो भंवरा था ना ही कली की उसे हसरत थी !!~ मोहन आलोक”

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