मैं जिन्दा हूँ शाययद इस लिए की मुझे खुद से बहुत प्यार था

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मैं जिन्दा हूँ शाययद इस लिए की मुझे खुद से बहुत प्यार था
सरद हवाओं में बिखरा नहीं
मेरा मन क्यूँ के दिल मेरा पहाड़ था
अगर तू आँखों से पर्दा  हटा लेती तो चाँद का दीदार हो जाता
फिर किस्सी खुद गरज इंसान का तुझे बहकाना सब बेकार हो जाता
ऊ ! मेघा की मस्त हवा अब जान गेई की अजनबी से टकराना  बेकार था
मैं जिन्दा हूँ शाययद इस लिए की मुझे खुद से बहुत प्यार था
सरद हवाओं में बिखरा नहीं
मेरा मन क्यूँ के दिल मेरा पहाड़ था

मैं कैसे तुम्हे बता दूं की अब भी मैं तुम्हे बहुत सम्मान देता हूँ
जिंदगी के सब पल मैं तेरी सुहानी भूली बिसरी यादों को ध्यान देता हूँ
तेरा बिखरना तेरा रोना तेरा तुरपना मुझे मेरी कब्र में सोने नहीं देता
मेरे दामन से लिपट तेरा यह विलापअब मुझे खुल के रोने भी नहीं देता
खुली और बंद आँखों मे सपने लिए क्यूँकी राधा को प्यार था
मैं जिन्दा हूँ शाययद इस लिए की मुझे खुद से बहुत प्यार था
सूरद हवाओं में बिखरा नहीं मेरा मन
क्यूँ की दिल मेरा पहाड़ था ~ मोहन अलोक

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