मैं हूँ उस माटी की धूल

 

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मैं हूँ उस माटी की धूल

 जहाँ खिले असंख्य फूल

मेरा हर कण अनमोल

पैमाने न कर भूल

मैं हूँ उस माटी की धूल

जहाँ खिले असंख्य फूल

राह मेरी पे चले असंख्य शूर

जिन्हे इस धरती पर था गरूर

मिट गए जिनका था न असूल

मैं हूँ उस माटी की धूल

जहाँ खिले असंख्य फूल

मेरा हर कण अनमोल

पैमाने न कर भूल

वक़्त ने जब वफ़ा न निभायी

इस धरती से गोद पायी

धरती माँ ही थी मेरी मोहब्बत

तुझसे था टकराना फ़िज़ूल

मैं हूँ उस माटी की धूल

जहाँ खिले असंख्य फूल

~~ मोहन अलोक

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