उड़ने दे इन् परिंदो को आज़ाद फ़िज़ा में

 

हाल पूछती नहीं दुनिया जिंदा लोगों का,
चले आते हैं ज़नाज़े पे बारात की तरह..Anonymous 
यह खुराफती नहीं यकीन करो ग़ालिब 
यह नाचीज क्या मदद कर पाये गा
आप जैसे सूरज को दिया दिखाने का 
चिश्ता नहीं कर पाये गा ~ मोहन अलोक
ग़ालिब की आशिकी 
भी कुछ अजीब थी 
हर बेवफा उसके करीब थी 
और कोई पीड़ापहारक दवा भी 
उस को कहाँ नसीब थी~ मोहन अलोक ..

उड़ने दे इन् परिंदो को आज़ाद फ़िज़ा में ग़ालिब,
जो तेरे अपने होंगे वो लौट आयेंगे किसी रोज़…

इक़बाल :

 

न रख उम्मीद-ऐ-वफ़ा किसी परिंदे से इक़बाल,
जब पर निकल आते हैं तो अपने भी आशियाना भूल जाते
है…

इक़बाल :

 

 
एक कब्र पर लिखा था…“किस को क्या इलज़ाम दूं दोस्तो…,
जिन्दगी में सताने वाले भी अपने थे,
…….और दफनाने वाले भी अपने थे..Anonymous 
 
 
 
ग़ालिब की आशिकी 
भी कुछ अजीब थी 
हर बेवफा उसके करीब थी 
और कोई पीड़ापहारक दवा भी 
उस को कहाँ नसीब थी~ मोहन अलोक ..