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नजारे

बदली थी जब जब ऊनकी नजर तो बदल गये सारे नजारे
धीरे से चलते रहे हम ऊनकी यादों की बैसाखी के सहारे
मायूस जब जब किया था ऊनकी य़ादों ने
मंजिल दिखी उनमे सपनो में हुई मुलाकातों से
नींद खुली तो बदल गये यह आसमान चाँद और सितारे
बदली थी जब जब ऊनकी नजर तो बदल गये सारे नजारे
धीरे से चलते रहे हम ऊनकी यादों की बैसाखी के सहारे
सामने मिली जब जब मन्जिल पर रास्ते खुद ब खुद मुड गये
सिंतारों की तमन्ना पाले थे पर नाता ज़मीन से जुर्ड गये
ज़िन्दगी की किशतियां समुद्र में भटकती रही दूर थे किनारे
बदली थी जब जब ऊनकी नजर तो बदल गये सारे नजारे
धीरे से चलते रहे हम ऊनकी यादों की बैसाखी के सहारे
सब गुलिस्तान रब ने तेरे ही लिये सजाये हैं
दरिया मोहब्बत के तेरे ही लिये ही बहाये हैं
पतझड़ में गिरती पीली पतियों को क्यूँ बहारों की याद पुकारे बदली थी जब जब ऊनकी नजर तो बदल गये सारे नजारे
धीरे से चलते रहे हम ऊनकी यादों की बैसाखी के सहार

__ मोहन आलोक

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