ancient indian history

Maharishi Vyas

Maharishi Vyas.

महर्षि व्यास :
व्यास महर्षि पराशर के पुत्र थे। उनकी माता का नाम सत्यवती या काली था। वह कैवर्त राज की पुत्री थी। व्यास का नाम कृष्ण था, क्योंकि उसका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप में हुआ था, उन्हें द्वैपायन भी कहते थे। उनकी जन्मतिथि वैशाख–पूर्णिमा मानी जाती है। वे कौरवों- पाण्डवों के पितामह थे। युधिष्ठिर महाभारत में उन्हें भगवान् कह कर सम्बोधन करता है : “आप ही हमारे लिए अत्यन्त पूज्य एवं गुरु हैं। आप हमारे राज्य एवं कुल के लिए परागति हैं।”

व्यास कृतित्व : व्यास की साहित्य साधना के तीन मुख्य क्षेत्र थे- वेद, पुराण एवं महाभारत ।
वेद
वेदों के सूक्तों को ऋषियों के अनेक आश्रमों से संकलित करके व्यास ने ऋगवेद, यर्जुवेद सामवेद और अथर्ववेद नामक चार संहिताओं में सम्पादन किया। वैदिक साहित्य के संरक्षण और प्रचार हेतु उन्होंने विभिन्न शिष्य परम्परा की स्थापना की। विष्णु पुराण के अनुसार ॠगवेद शिष्य परम्परा में मुख्य ऋषि पैल, इन्द्र प्रमति, वाष्कल, बोध्य याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय, सत्यश्रवस, सत्यहित, सत्यश्री, पूर्ण, जगारि, शाक, वत्स शैशरेय, आदि थे। यजुर्वेद शिष्य परम्परा में वैशम्पायन, याज्ञवलक्य, ब्रह्माराति तित्तिरि माध्यंदिन काण्य, याज्ञवल्क्य, श्यामायनि, आसुर आलम्बि आदि थे। सामवेद शिष्य परम्परा में मुख्य ऋषि जैमिनि, सामन्तु जै० सुत्चन जै० सुकन जै०, पौष्मिण्डच, लौगाक्षि, कुथुमि कुशितिन्, लांगलि, राणयनि, ताण्डिपुत्र, पराशर, भागवित्ति, लोमगायनि, पराशर्य, प्राचीन योग, आसुरायन व पंतजलि थे। अथर्व वेद शिष्य परम्परा में सुमन्तु, कबंध, पथ्यदेवादर्श पिप्लाद, जाजलि शौनक, सौंधवायन, बभु व मुंजकेश आदि थे। यज्ञों के अनुष्ठान हेतु व्यास ने चातुर्होत्र विधि की स्थापना की। यजुर्वेद से अध्वर्यु का कर्म, ऋग्वेद से होताका, सामवेद से उद्गाता तथा अथर्ववेद से ब्रह्मा के कर्म व्यवस्थित किए। इसके अनुसार यज्ञों का कर्मकाण्ड चार विशेषज्ञ पुरोहितों में बांट दिया गया। ऋग्वेद सम्बंधी प्रक्रिया होता, के निर्देशन में यजुर्वेद की अध्वर्यु के सामवेद की उद्गाता के निर्देशन में होती थी। इन तीनों का अध्यक्ष ब्रह्मा कहलाता था।

इतिहास पुराण के विद्यार्थी के रूप में व्यास ने सूत वंश में उत्पन्न महा मेघावी रोमहर्षण को अपना शिष्य बनाया। महाभारत अठारह पर्यों में विभक्त है। आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण। हरिवंश महाभारत का ही परिशिष्ट माना जाता है। इसके समावेश से महाकाव्य की श्लोक संख्या एक लाख होती है। व्यास केवल महाभारत के ही रचयिता नहीं थे, बल्कि उन्होंने वेदों में प्रदिष्ट जीवन मूल्यों को महाभारत की ऐतिहासिक कथा और पुराणों द्वारा जनसाधारण तक पहुँचाया। उपनिषदों का सार, गीता के अमर सन्देश द्वारा सबके लिए सुलभ बना दिया।
पंतजलि के महाभाष्य में महाभारत कथा का निर्देश अनेक बार हुआ है। व्यास पुत्र शुकदेव का भी उल्लेख है। क्योंकि उसने वेदों का विश्लेषण किया, इसलिए उसे व्यास नाम से याद किया जाता है।
व्यास पाण्डवों के हित चिन्तक थे। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वे ब्रह्मा बने थे। इसी अवसर पर उन्होंने क्षत्रिय-संहार की भविष्यवाणी की थी। नारद से प्राप्त सात्वत ज्ञान का उपदेश उन्होंने भीष्म युधिष्ठिर, मैत्रेय व शुक देव आदि को प्रदान किया। बनवास के दौरान युधिष्ठिर आदि को प्रति स्मृति विद्या” भी उन्होंने दी। इस विद्या से अर्जुन ने रूद्र व इन्द्र से अनेक अस्त्र प्राप्त किए। महाभारत युद्ध के दौरान व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की, तथा युद्धवार्ता धृतराष्ट्र तक पहुँचाने की व्यवस्था की। युद्ध के बाद संजय को प्राप्त दिव्यदृष्टि समाप्त हो गई। पुत्र हत्या से दुखी गांधारी पाण्डवों को शाप देने को उद्यत हुई, तो व्यास ने उसे रोका। युद्ध के पश्चात् उन्होंने निराश युधिष्ठिर को शंख, लिखित, सुघुमन, हथग्रीव, सेनजित आदि राजाओं के चरित्र सुनाकर राजधर्म व राजदण्ड का उपदेश दिया तथा निराशावादी न बनने का उपदेश देकर, मन की शान्ति हेतु प्रायश्चित विधि बताई व अश्वमेघ यज्ञ का आदेश दिया। इस यज्ञ में अर्जुन को अश्व रक्षा, भीम को राज्य रक्षा, नकुल सहदेव को कुटुम्ब व्यवस्था का कार्य भी उन्ही द्वारा सौंपा गया। व्यास दीर्घ जीवी थे। वे शान्तनु से लेकर परिक्षित के पोते शतनीक तक आठ पीढ़ियों के समकालीन रहे। ऋषियों में असामान्य प्रतिभा, क्रान्तदर्शी, अगाद्यविद्वता, वैराग्य एवं संगठन कौशल्य आदि का समावेश आवश्यक माना जाता था। इन सारे गुणों की व्याप्त जैसी मूर्तिमंत साकार प्रतिमा प्राचीन भारतीय इतिहास में नहीं पाई जाती है। इसीलिए पुराण साहित्य में उन्हें विष्णु, शिव, ब्रह्मा का अवतार माना जाता है।
व्यास की पत्नी का नाम घृताची था। उससे शुक नामक पुत्र हुआ। व्यास ने शुक देव को वेद वेदांग महाभारत आदि का ज्ञान दिया। शुक का गुरु वृहस्पति था। अपने पिता के आदेशानुसार उसने गुरू से मोक्षतत्व प्राप्त किया। अपने पिता से भागवत पुराण की कथा भक्ति-भावना से सुनी और बाद में यह पुराण परिक्षित को सुनाया। भागवत पुराण भक्तिप्रधान ग्रंथ है, अतः इसे “अखिल श्रुति सार” एवं “सर्व वेदान्त सार” कहा गया है। शुक देव आरम्भ से ही विरक्त थे। उपनयन के पूर्व ही उन्होंने जीवन की समस्त भोग वस्तुओं का त्याग कर दिया था। पुराणों में उन्हें महायोगी एवं योग शास्त्र का रचयिता कहा गया है। शुकदेव ने पीवरी से विवाह कर व्यास वंश चलाया। उनके भूरिश्रवस, प्रभु शंभु, कृष्ण एवं गौर नामक पांच पुत्र व कीर्तिमती पुत्री हुई। कीर्तिमती का विवाह अणुह राजा से हुआ।
उसके पति का नाम ब्रह्मदत्त था। शुक निर्वाण महाभारत में उनके महा निर्वाण का विस्तृत वर्णन है। पिता को अभिवादन कर वे कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ बैठ गए। तत्पश्चात् वायुरूप धारण कर वे आकाश मार्ग से आदित्य लोक में प्रविष्ठ हुए उनके पिता “हे शुक” कह कर विलाप करने लगे। शुक सदैव वस्त्रहीन रहते थे। नग्न अवस्था में ही वे परिक्षित से मिलने गए थे। शुक योनि-भेद से ऊपर उठ गए थे, जो व्यास नहीं कर पाए थे।
English Translation
Maharishi Vyas: Vyas was the son of Maharishi Parashar. His mother’s name was Satyavati or Kali. She was the daughter of Kaivarta Raj. Vyasa was named Krishna, because he was born on an island inside the river Yamuna, also known as Dwaipayana. His date of birth is considered to be Vaishakh-Purnima. He was the grandfather of Kauravas and Pandavas. Yudhishthira addresses him as God in the Mahabharata: “You are the most worshipable and our teacher. You are a God for our state and clan.”
Vyasa Krittitva: There were three main areas of Vyasa’s literary practice – Vedas, Puranas and Mahabharata. Veda By compiling the Suktas of the Vedas from many ashrams of sages, Vyasa edited them in four codes named Rigveda, Yajurveda Samveda and Atharvaveda. For the preservation and promotion of Vedic literature, he established various disciple traditions. According to the Vishnu Purana, the main sages in the Rigveda disciple the traditions were: Pail, Indra, Pramati, Vashkala, Bodhya Yajnavalkya, Parashara, Mandukeya, Satyashravas, Satyahit, Satyashri, Purna, Jagari, Shaka, Vatsa Shaishreya, etc. Vaishampayana, Yajnavalkya, Brahmarati Tittiri Madhyandin Kanya, Yajnavalkya, Shyamayani, Asura Alambi etc. were in the Yajurveda disciple traditions. The main sages in the Samaveda disciple tradition were Jaimini, Samantu Jai, Sutchan Jai, Sukan Jai, Paushmindach, Laugakshi, Kuthumi Kushitin, Langali, Ranayani, Tandiputra, Parashar, Bhagavitti, Lomgayani, Parasarya, ancient yoga, Asurayan and Patanjali. In the Atharva Veda disciple traditions, were Sumantu, Kabandha, Pathyadevdarsh Piplad, Jajali Shaunak, Saundhwayan, Babhu and Munjkesh etc.
Vyasa established the Chaturhotra method for the performance of sacrifices. He arranged the rituals of the Adhvaryu from the Yajurveda, the Hotaka from the Rigveda, the Udgata from the Samaveda and the rituals of Brahma from the Atharvaveda. Accordingly, the ritual of the sacrifices was divided among four specialized priests. The process relating to the Rigveda was under the direction of the Adhvaryu of the Yajurveda and the Udgata of the Samaveda.
The creator of these three scriptures is called Brahma. As a student of History and Puranas, Vyasa created Maha Meghavi Romaharsana.
The Mahabharata is divided into eighteen fairy tales. etc., assembly, forest, huge, industry, Bhishma, Drona, Karna, Shalya, Sauptika, woman, peace, discipline, Ashwamedhika, ashram dweller, Mausal, Mahaprasthanika, ascension. Harivansh is considered to be an appendix to the Mahabharata. It’s inclusion brings the number of verses of the epic to one lakh. Vyasa was not  the only author of the Mahabharata, but he had also conveyed the life values enshrined in the Vedas to the masses through the historical story of the Mahabharata and the Puranas. The essence of the Upanishads, made accessible to all by the immortal message of the Gita. The Mahabhashya of Pantjali refers to the story of the Mahabharata several times. Shukadeva, son of Vyasa, is also mentioned. Because he analyzed the Vedas, he is remembered as Vyasa. Vyasa was keen advisor of the Pandavas. He became Brahma in Yudhisthira’s Rajasuya Yajna. It was on this occasion that he predicted the extermination of the Kshatriyas. He imparted the Satvat knowledge received from Narada to Bhishma, Yudhisthira, Maitreya and Shuka. He also gave Smriti Vidya to Yudhisthira and others during their exile. With this knowledge, Arjuna obtained many weapons from Rudra and Indra. During the Mahabharata war, Vyasa granted Sanjaya divine vision, and arranged for news of the war to reach Dhritarashtra. After the battle, Sanjay lost his divine vision. Gandhari, grieved by the murder of her son, was about to curse the Pandavas, but Vyasa stopped her. After the battle, he told the disappointed Yudhisthira about the characters of kings like Shankha, Likhita, Sughumana, Hathagriva, Senjit and others and advised him not to become a pessimist. In this sacrifice, Arjuna was entrusted with the protection of the horse, Bhima with the protection of the kingdom and Nakula Sahadeva with the task of family management. Vyas was a long-lived sage. He was a contemporary of eight generations from Shantanu to Parikshit’s grandson Shatanik. It was considered necessary to incorporate unusual talent, revolutionary vision, advanced scholarship, renunciation and organizational skills in the sages. The embodied embodiment of all these qualities as pervasive is not to be found in ancient Indian history. That is why in Purana literature, he is considered as the incarnation of Vishnu, Shiva, Brahma. Vyasa’s wife’s name was Ghritachi. He had a son named Shuka. Vyasa gave knowledge of Vedas, Vedangas, Mahabharata etc. to Shuka. Venus’ master was Jupiter. As per the order of his father, he received the essence of salvation from the Guru. He heard the story of the Bhagavad Purana from his father with devotion and later related it to Parikshit. The Bhagavad Purana is a devotional text, hence it is called “Akhil Shruti Sar” and “Sarva Vedanta Sar” Shuka Dev was detached from the beginning. Before his marriage, he had renounced all the pleasures of life. In the Puranas, he is described as the great yogi and the author of the Yoga Shastra. Shukdev married Peevari and ran the Vyasa dynasty. He had five sons named Bhurisravas, Lord Shambhu, Krishna and Gaur and a daughter named Kirtimati. Kirtimati married King Anuh. Her husband’s name was Brahmadatta. Shuka Nirvana The Mahabharata contains a detailed description of his great Nirvana. After greeting his father, he sat down in meditation on Mount Kailash. Then, assuming the form of air, he entered the sun through the sky and began to lament, saying to his father, “O Shuka”
Shuka was always naked. He had gone to meet Parikshit while being naked. Shuka had risen to a spirituality level, which Vyasa could not achieve.

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