ancient

Rishi Tapodat

ऋषि  तपोदत (यवक्रीत)
गंगा नदी के तट पर रैभ्य नामक एक महामुनि निवास करते थे। उनके आश्रम के नजदीक ही महर्षि भारद्वाज का आश्रम था। दोनों में घनिष्ठ दोस्ती थी। परस्पर एक-दूसरे के सुख-दुख का विचार रखते थें। रैभ्य मुनि के दो पुत्र थे-अर्वावसु और परावसु। दोनों भाई बुद्धिमान और समस्त विद्याओं में पारंगत थें। एक दिन की घटना है। परावसु की पत्नी सुप्रभा पास ही स्थित नदी में स्नान करने के लिए जा रही थी। वह एक अपूर्व सुंदरी थी। यवक्रीत की कुदृष्टि उस पर पड़ी। उसके इस हरकत से महर्षि रैभ्य ने यवक्रीत को मार दिया था। इसका दुखी पिता भारद्वाज, अग्नि-समाधि लेने वाला था कि रैम्य के पुत्र अर्वावसु ने इसे जीवित कर दिया। यवक्रीत अपने पिता भारद्वाज, की तरह वेदमंत्र रचने में असमर्थ था। यवकृत को शिक्षा प्राप्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी और वह गुरुकुल से दूर रहता था। अनपढ़ रहने के कारण समाज में उनका सम्मान नहीं था। उनके लिए गुरुकुल में छोटे बच्चों के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखना बेहद मुश्किल था क्योंकि वह बूढ़े हो गए थे। इसलिए उन्होंने भगवान इंद्र की तपस्या करने का सोचा और वरदान मांगकर सारा ज्ञान प्राप्त करना चाहा । ज्ञान प्राप्त करने हेतु वह तप करने लगा। उन्होंने भगवान को प्रसन्न करने के लिए गंगा के तट पर तपस्या की। भगवान इंद्र उसके मन की बात समझ गए। इन्द्र ने उसे समझाया कि ज्ञान तपस्या से नहीं, अध्ययन से प्राप्त होता है। परन्तु वह उसकी अवहेलना करके अग्नि प्रज्वलित कर कठोर तप करने लगा। एक दिन एक वृद्ध उसके पास बैठ, बालू की एक-एक मुट्ठी करके भागीरथी में डालने लगा यवक्रीत ने उससे पूछा कि वह कया कर रहा है? उसने बताया कि वह नदी पर पुल बांध  रहा है। यवक्रीत उसकी मूर्खता पर हंसते हुए बोला कि नदी पर इस तरह पुल नहीं बांधा जाता। वह अपना श्रम व्यर्थ गंवा रहा है। वृद्ध ने कहा, “ज्ञान भी इस तरह प्राप्त नहीं होता। तुम भी अपना समय व्यर्थ गंवा रहे हो।”
साधु ने उसे सलाह दी कि, ‘ज्ञान प्राप्त करने की कोई सीमा नहीं है। यदि वह अपना मन बना लेता है, तो वह अभी भी अपने पिता की तरह एक महान विद्वान बन सकता है।’
यवक्रीत ने इन्द्र को पहचान कर क्षमा मांगी। इन्द्र ने यवक्रीत को वर दिया कि वे सर्वश्रेष्ठ ऋषि होंगे और वेद-ऋचाओं की रचना करेंगे। यवकृत बाद में एक महान विद्वान बने और महान ऋषी तपोदत के नाम से विख्यात हुये।
English Translation.
Rishi Tapodat (Yavakrit)
A sage named Raibhy, used to live on the banks of river Ganga. Near his ashram was the ashram of Maharishi Bhardwaj. Both had a close friendship. They used to care each other and think about each other’s happiness and sorrow. Raibhy Muni had two sons – Arvavasu and Paravasu. Both the brothers were intelligent and well versed in all the sciences. One day, Paravasu’s wife Suprabha was going to bathe in the nearby river. She was extraordinarily beautyful. Yavkrit’s evil eye fell on him.
Maharishi Raibhy killed Yavakrit because of his evil act. When his grieving father, Bharadvaja, was about to take a fire-burial when Arvavasu, the son of Raibhy brought him back to life. Yavakrit was unable to compose Ved mantras like his father Bharadvaja. Yavkrit was not interested in getting education and used to stay away from Gurukul. Being illiterate, he was not respected in the society. It was extremely difficult for him to continue his studies with the younger children in the Gurukul as he had got older. That’s why he thought of doing tapasya of Lord Indra and wanted to get all the knowledge by asking for a boon. He started doing tapasya to get knowledge. He did penance on the banks of the Ganges to please the Lord. Lord Indra understood his mind. Indra explained to him that knowledge is not gained by penance, but by study. But ignoring him, he lit a fire and started doing severe penance. One day an old man sat beside him, started pouring handfuls of sand into the Bhagirathi. Yavkrit asked him what he was doing. He told that he is building a bridge over the river. Laughing at his stupidity, Yavkrit said that such a bridge can not be built over the river. He is wasting his labor in vain. The old man said, “Even knowledge is not attained in this way i.e tapasya. You are also wasting your time.”
The sage advised him that, ‘There is no limit to attaining knowledge. If he makes up his mind, he can still become a great scholar like his father.’
Yavkrit recognized Indra and apologized. Indra gave a boon to Yavakrit that he would be the best sage and shall compose the Vedas. Yavkrit later became a great scholar and became famous as a great sage, namely Rishi Tapodat.

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